रविवार, 26 जनवरी 2014

कैमरे के साथ साथ .



फोटोग्राफी का शौक लम्हों को कैद करता आया है,कुछ मेरी यादों में बसे है,कभी बिलासपुर सहित दिल्ली तक मिनिट कैमरा सड़क के किनारे आपने सेट में फोटो खींचता..नारायण ताजमहल के परदे के सामने जब इस कैमरे के पीछे काले कपड़े में सर डाल कर फोटो लेता तो मै उसे देखता, बिना बिजली पांच मिनट में फोटो,बिलासपुर  का घोष परिवार फोटोग्राफी की दुकानों में अव्वल था. प्रेस फोटोग्राफी में ये याशिका 635 का युग था,मैंने भी पिताजी का याशिका कैमरा ले लिया, सीनियर नागरवाला प्रेस फोटोग्राफर माने जाते उनके पास 'मामिया' था घर में स्टूडियो उनकी फोटो आज धरोहर हैं जो उनके सुपुत्र जीडी नगरवाला के पास जो नवभारत में फोटो जनर्लिस्ट है.

एसएलआर कैमरे ने युग में नया दौर ला दिया.एस के सिन्हा, सतीश जायसवाल के पास नोकिया,और राहुल सिंह,राजू तिवारी,श्रीकांत खरे मेरे सभी दोस्तों के भी इस तरह का कैमरा था. मुझे याद है मैं और श्रीकान्त बस्तर के उसे इलाके तक फोटो के लिए पहुंचे जिसे आज नक्सल प्रभवित माना जाता है. बाद जगदलपुर के दशहरे में फोटो लेते कलेक्टर पोर्ते जी ने पकड़ा लिया और जो रील कैमरे में थी उसे निकल दिया. बसंत भाई ने कैमरा वापस  दिलवाया,तब तक बीबीसी वाले यहाँ की फोटो ले जा चुके  थे.हम यहाँ नवीन चतुर्वेदी के घर रुके थे जो रत्न परिष्कार केंद्र के प्रमुख थे..बस्तर की फोटो में अशोक पागनिस का कोई सानी नहीं था.

तब फैशगन के बल्ब हर बार बदले जाने का युग जा चुका था,कभी वो फट भी जाते,रायपुर में गोकुल सोनी के फोटो नवभारत में शब्द नहीं चित्र बनते,फोटोग्राफर और स्टूडियो की अब कमी नहीं.हर नये कैमरे को पुराना होने में समय नहीं लगता,पर ये बात सही है की फोटो कैमरा नहीं कैमरे के पीछे खड़ा आदमी और उसका हुनर लेता है.आज गन से नहीं कैमरे से वन्यजीवों की शूटिग होती है.ये बड़ी भली बात है.[फोटो नेट से ]

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