कौमी एकता और भाईचारे में इस सुर्ख फूल ने काफी अहम् भूमिका अदा की है। मुझे इस अजनबी फूल ने अपनी रंगत से खींच लिया और इसकी फोटो मैं ले रहा था। या बात है इस 28जनवरी की,जगह पश्चिम बंगाल के सुंदरबन के झारखंडी आइलैंड के मैन्ग्रोव वाइल्ड रिसोर्ट की,तभी इस रिसार्ट के मालिक सोमनाथ दा ने बताया गुरुदेव रवींद्रनाथ टेगौर,ने राखी के पर सबको एक सूत्र में बाँधने राखी बढ़ने का अभियान छेड़ा जिसमे जातिगत भावना से उठ रक्षा बंधन किया। जिसमे राखी ये फूल बना।सोमनाथ दा के इस बयान को गूगल ने मैच किया और ये । वो नीचे वो पेस्ट है।
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने राखी के पर्व को एकदम नया अर्थ दे दिया. उनका मानना था कि राखी केवल भाई-बहन के संबंधों का पर्व नहीं बल्कि यह इंसानियत का पर्व है. विश्वकवि रवींद्रनाथ जी (Rabindranath Tagore) ने इस पर्व पर बंग भंग के विरोध में जनजागरण किया था और इस पर्व को एकता और भाईचारे का प्रतीक बनाया था. 1947 के भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में जन जागरण के लिए भी इस पर्व का सहारा लिया गया. इसमें कोई संदेह नहीं कि रिश्तों से ऊपर उठकर रक्षाबंधन की भावना ने हर समय और जरूरत पर अपना रूप बदला है. जब जैसी जरूरत रही वैसा अस्तित्व उसने अपना बनाया. जरूरत होने पर हिंदू स्त्री ने मुसलमान भाई की कलाई पर इसे बांधा तो सीमा पर हर स्त्री ने सैनिकों को राखी बांध कर उन्हें भाई बनाया. राखी देश की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, हितों की रक्षा आदि के लिए भी बांधी जाने लगी है. इस नजरिये से देखें तो एक अर्थ में यह हमारा राष्ट्रीय पर्व बन गया है."
जब मैंने सोमनाथ दा से फूल का नाम पूछा तो वो बोले,
रक्षाबन्धन फूल।।
सूर्योदय हो या सूर्यास्त, पश्चिमी बंगाल का सरहदी इलाके का समंदर लाल हो जाता है। कुल 57 आइलैंड पर चार इतने आबाद की सैलानियों के लिए वन्यजीव और समुन्द्र में जाने के प्रवेशद्वार, बात झारखण्डी की है।जब यहां से सुंदरवन रवाना हुआ तब मेरे वाइल्ड लॉइफ फोटोग्राफर मित्र शिरीष डामरे ने कहा- मेरे लिए थोड़ा सा सुंदरवन का चावल ले आना।। जिस होम रिसार्ट में हम रुके वहां जल्दी ही घनिष्टता हो गई। दूसरे दिन तड़के रिसार्ट का मालिक सोमनाथ दा सामान लेने मार्केट जा रहे थे, उनके साथ में भी हो लिया, बातचीत में पता चला,Shirish Damreको जिस चावल का स्वाद दो साल बाद भी याद था उसका नाम है, दूधेश्वर, दा ने बताया कि, एक ऐसा दुकानदार है जो खेतों में उसे उपजता है और अपनी दुकान में बेचता है।। मैंने उससे 29 रूपये में एक किलो चावल लिया।
जब हम रिसार्ट पहुंचे तब पूछा, यहां कौन सा चावल बनता है, जवाब मिला बाबा जी का बासमती, ला कर पैकेट भी दिखया, कहा अतिथि बासमती की और ब्रान्डेड चावल की मांग करते हैं। इसलिए इसे बनते हैं। उसे दिन बिना रासायनिक खाद का उपजा चावल दुधेश्वर बना, कोई ये नहीं जाना की ब्रान्डेड बासमति नहीं।
लेकिन इस ब्रांडिंग के चलते, लोकल किसानों का उपजा दूधेश्वर, बाज़ार से बाहर हो गया। एक तो वहां खेती करना कठिन है, फिर जैवविविधता से एक चावल लुप्त हो रहा। मुझे समंदर का पानी लाल दिखा, जरूर उसकी लाली में झोपडी में रहने वाले उन किसानों का गुस्सा शामिल होगा, जो दूध सा सफेद और ईश्वर सा पवित्र धान दुधेश्वर परम्परागत उपजते रहे, और बासमती की बॉन्डिंग जनित मांग से चुपके से विमुख हो गए या हो रहे हैं।
समय बदला,कलकत्ता का नाम बदला,कोलकाता हो गया पर हाथ से खींचने वाला रिक्शा आज भी इसकी सड़कों पर दौड़ रहा है। सन 1953 'दो बीघा जमीन' का शम्भू (बलराज साहनी) विक्टोरिया मैमोरियल हो या धर्मतल्ला से सवारी की तलाश में धुँधुरू बजाता है। मोलभाव बाद वो रिक्शे में जुत जाता है, पेट के लिए, अपने घर की गाड़ी चलाने, सड़कों पर हांफता सवारी और उम्र का बोझ लिए दौड़ रहा है।
सुंदरवन से वापसी पर इनसे मुलाकात हो गई, दुखित एक रिक्शा वाला बोला, सरकार ने कुछ नहीं किया, उसकी मांग थी सरकार रिक्शा दे दे।। याने वो जिस रिक्शे को खींचता वो भी किराए का है।। 26 जनवरी गणतंत्र दिवस की रौशनी से जगमगता कोलकाता, और उसमें लगा विवशता का ये पैबंद, मेहनतकशों की हिमायती माने जाने वाली सरकारे बनीं, पर इन बद नसीबों की तकदीर न संवरी,। धिक्कार है, मानवता की बात करने वालों को,जो इनकी मज़बूरी की संकल आज तक न् काट उनकी विवशता को नियति माने आँख मूंदें हुए है।
( , जाने इनकी सुबह कब होगी )
छतीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर के किले का वैभव लौटाने का काम हुआ है। यदि इस किले में दिल्ली के लालकिले की भांति ध्वनि और प्रकाश शो प्रति सन्ध्या टिकट पर दिखाया जाए तो कल्चुरी वंश के साथ छतीसगढ़ के इतिहास और इस विरासत की जानकारी माँ महामाया,खूंटाघाट आये बहुतेरे सैलानियों को सन्ध्या मिला करेगी। इसकी भाषा का माध्यम मीठी बोली छतीसगढ़ी हों सकता है।।
इस किले में सैलानियों के लिए इस शो के लिए बैठने का इंतजाम किले के भीतर हो सकता है, और चारों तरफ इस शो के उपकरण लग सकते हैं। वर्तमान ब्रेल लिपि में किले की कुछ जानकारी दी गई है।। ये बिलासपुर से मात्र 25 किमी पर है। बस इस तरफ पर्यटन और संस्कृति विभाग की पहल जरूरी है, वो ये काम किसी निजी एजेंसी को भी सौंप सकते है।।
कभी उजाड़ हो गया ये किला आज शहर की रौनक है, मत्री आते है और रतनपुर के विकास की बात करते है,पर बायपास के बाद सड़कें वीरान है, ये ऐतिहासिक नगरी का प्राचीन गौरव वैभवशाली है,इस शो में वह सब जोड़ा जा सकता है ,,!
हाईप्रोफाइल, स्व लखीराम स्मृति आडिटोरियम अब बिलासपुर शहर की शान है, स्मार्ट सिटी की महत्वपूर्ण जरूरत, पर इसके किये जरूरी गतिविधियों की महती आवश्यकता और माहौल। फिलहाल इसकी कमी है। अगर कमी न होती तो समीपवर्ती राघवेन्द्र राव सभा भवन में कोई आयोजन होता न की हैंडलूम के कपड़े,अचार,खिलौने,प्रदर्शनी के नाम पर विक्रय होते।बिलासपुर की भूमि उर्वरा है,सत्यदेव दुबे, शंकर शेष, श्रीकांत वर्मा,को भला कौन नहीं जानता, जब तक बीआर यादव और रामबाबू सोन्थलिया रहे, वीणा वर्मा जी का आना जाना रहा, साल में एक दो बार श्रीकांत वर्मा की प्रतिमा पर दीपक जलता पर अब कोई देखने वाला नहीं, डा प्रमोद वर्मा, की याद आज भी ताजा है, डा गजनन शर्मा,पालेश्वर शर्मा, विप्र जी, विस्मृत होने वाले नहीं, पं श्याम लाल चतुर्वेदी, डा सक्सेना, सतीश जायसवाल, मनीष दत्त,इप्टा के कई कलाकार इस शहर को रोशन कर रहे हैं।
बिलासा कला मंच के आयोजन और सोमनाथ यादव की सक्रियता, डा कालीचरण यादव, और हरीश केडिया की संगठन क्षमता इस शहर की पूंजी है। बसन्ती वैष्णव का कथक के प्रति समर्पण,पुष्पा दीक्षित की विद्वता कासानी मिलना कठिन है। अंचल शर्मा का परिवार नहीं, अब वो कला का घराना हो चला है। छत्तीसगढ़ राज भाषा आयोग के अध्यक्ष डा पाठक, गुण सम्पन्न हैं।
सवाल ये है और भी कितनी प्रतिभा शहर में बिखरी हैं, पर सभी सभागार सूने क्यों हैं। रेलवे,कोयल कम्पनी, सिम्स, के अलावा,पण्डित दीक्षित सभागार वीरान क्यों हैं। मुशायरों का दौर भी जाता रहा।
लगता है, बिलासपुर संस्कारधानी नहीं रह गई। कभी बड़े कवि सम्मेलन और उत्सव में रात आँखों में कट जाती थी, आज माल है, बार है, होटल है, पर वह सास्कृतिक महौल नहीं। शून्यता की स्थित बन चुकी है। पर ऐसा नहीं, आज भी काफी प्रतिभा है, जरूरत है, चिन्हित कर एक मंच पर लाके सक्रिय बनने की। ये पहल करनी होगी।। किसी शहर की पहचान, आलीशान इमारतों से नहीं बनती शहर के बाशिंदों के अदब और तहजीब से बनती है।
सवाल है,करोडों रूपये की लागत से बना ये नया सभागार क्या वीरान रहेगा,इसका सञ्चालन कौन करेगा, सांस्कृतिक बयार न बही तो इस आलीशन भवन का नगर निगम के आने जाने वाले परम्परागत अधिकारीयों के हाथों कालांतर किस गति को प्राप्त होगा, फिलहाल तो आशंका के बादल छाये हैं, शायद संस्कृति विभाग के पास कोई दूर की कौड़ी हो।।
छत्तीसगढ़ सरकार को अब महानदी सहित अन्य नदियों के पानी को एनीकट बना कर उद्योगों को देने के पहले सोचना होना, सिहावा से निकल कर 858 किलोमीटर का सफर तय करती हुए महानदी बंगाल की खाड़ी में मिलती है। अब महानदी की धारा उड़ीसा में कमजोर हो रही है। ओडिशा बीजू दल की 12 सदस्यीय टीम ने रायगढ़ और बिलासपुर का दौरा किया और परखा क़ि महानदी के पानी को छत्तीसगढ़ सरकार उद्योगों के लिए ले कर उड़ीसा के हित पर कुठाराघात तो नहीं कर रही। बीजद के सांसद प्रसन्ना आचार्य की अगुवाई में छत्तीसगढ़ पहुंची इस टीम का छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस ने हर जगह विरोध किया। जोगी समर्थकों ने गिरफ्तारियां दी। जांजगीर से CG Wall ने खबर दी है, प्रवास टीम के साराडीह बैराज का अवलोकन का आठ घण्टे जल सत्याग्रह कर विरोध किया गया। इसकी अगुवाई गीतांजलि पटेल ने की।इस पोस्ट में इसकी फोटो उसी खबर से साभार है।
बिलासपुर की अरपा नदी पर बैराज अभी भैंसाझार में बन रहा है। इससे 92 गाँव में 25 हज़ार हेक्टर खेती में सिंचाई होगी। उड़ीसा के सांसद आचार्या ने यहाँ पत्रकारों से साफ किया क़ि, छत्तीसगढ़ सरकार किसानों के लिए डेम बनाये तो उड़ीसा को दिक्कत नहीं,पर उद्योग को एनीकट बना कर पानी देती है तो महानदी की धार कम होने की चिंता उड़ीसा को लगी है,क्योकि उसके 15 जिलों की यह जीवन रेखा है।
महानदी में इस अंचल की लगभग सभी बड़ी नदिओं का पानी मिलता है, और महानदी पर प्रमुख बाँध रुद्री, गंगरेल,तथा हीराकुद हैं। प्रवासी दल ने सिंचाई विभाग के आला अधिकारियों की बैठक ली जिसमें जानकारी दी गई कई नियमानुसार 30 फीसद जल ही छत्तीसगढ़ में उद्योगों को दिया जा रहा है।
इस प्रवासी टीम के दौरे से साफ है, महानदी जैसी विशाल नदी भी जल की कमी से सूखने की और है, नदी पर भार बढ़ रहा है। जोगी कांग्रेस ने जिस तरह छत्तीसगढ़ के हितार्थ सामने आई है, वह दूजों के लिए सबक है। साथ ही अब छत्तीसगढ़ को जलप्रबन्ध पर ध्यान देना होगा क्योकि उड़ीसा की नज़र है।
वो जो झुके कांधों जंगल,की सड़क पर चल रहा हैयकीन कीजिये उसका कद,साल के पेड़ों से भी बड़ा है।।ये हैं, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर पीडी खेरा, जो उम्र के चौथे पड़ाव पर अचानमार टाइगर रिजर्व के कोर एरिया के गांव लमनी में रहते हैं और आदिवासी उत्थान के लिए कार्यरत हैं।
वो सन् 1982 के पहले विवि के छात्रों के दल को लेकर बैगा आदिवासियों के सामाजिक अध्ययन के लिए छत्तीसगढ़ के इस इलाके से जुड़े और बाद वो इस जंगल के गांव में कच्चे मकान में वानप्रस्थ बिताने यहां पहुंच गए।
अकेले लमनी गाँव में रहते है और 87 साल की इस उम्र में जीवट हैं। रोज बस से दो घाट पार कर छपरवा जाते है और वहां के छात्र छात्रों को अंग्रेजी और अन्य विषय पढ़ाते है। उनकी मेहनत लगन का फल है की बैगा आदिवासी छात्र अंग्रेजी में अच्छे नम्बर से पास होते हैं जो नौकरी में मददगार भी होती है।
गाँधीवादी खेरा,इस बार मैं और शिरीष गुरुपूर्णिमा पर जब अमरकंटक जा रहे थे तब छपरवा गाँव में एक महिला के कच्चे से होटल में अख़बार पढ़ते और लमनी के लिए बस की प्रतीक्षा में दिखे,गुरुवर को देख हमने कार में साथ ले लिया,पर होटल की मालकिन को ये न भाया, वो क्यों ले जा रहे हैं,इस पर नाराज हो गई, मुझे लगा कि खेरा सर अखबार पढ़ कर उसे दुनिया में क्या हो रहा है उससे अवगत करते होंगे और बस के पहले हम साथ उनके जाने से वो इस ज्ञान से वंचित रह गयी है।
गांधीवादी प्रो खेरा अपने अतीत पर अधिक बात नहीं करते पर सब जानते हैं कि उनके पढ़ाये बच्चे ऊँचे पदों पर दिल्ली में कार्यरत हैं और उनकी एक पाती से वो जंगल और आदिवासी हितार्थ सक्रिय हो जाते हैं। सन्ध्या से रात तक वो थैले में चना,मुर्रा आदिवासी बच्चों को वितरण करते बेरियर के आसपास दिखते हैं, इस तरह बात कर उनको पढ़ने से प्रेरित करते हैं, और गाँवो के दुःख सुख का पता लगा लेते हैं। वानप्रस्थ व्यतीत कर रहे, गुरु पीडी खेरा को मेरा कोटि कोटि नमन।