बुधवार, 11 दिसंबर 2013

गुल बकावली के फूल



गुल बकावली का फूल आज से पचास साल पहले अमरकंटक में माई की बगिया के दलदल में खिलता था, तब यहाँ इतना दलदल होता कि, यदि लकड़ी उसमें डाल दे तो खीच कर निकलना कठिन होता था.तब में अपने पिताजी चमनलाल चड्ढा जी के साथ जब भी अमरकंटक जाता तो माई की बगिया में इसके फूलों को देखता और किसी नई चीज को देखने की सुखद अनुभूति होती..

   आज वातावरण में तब्दीली के कारण माई की बगिया  में गर्मी  में थोड़ी से जगह में यहाँ दलदल बचा रहता है,मगर गुल बकावली  के फूल आज भी वहां खिलते है,पर उतने नहीं बहुत कम. नेत्र रोगों के लिए अचूक ये औषधीय फूल अमरकंटक के अलावा अब मैदानी इलाके में भी  गया है, और ये मेरी बिलासपुर में गाँव मंगला की बगिया के सुगन्धित फूलों में एक है..!मैंने से कुछ सीपेज वाले क्षेत्र में लगाया है जहाँ गोबर खाद की भरमार है..!

 मेरे पास इसके काफी पेड़ हो गये है, ये बरसात से ठंड तक खूब खिलते हैं, दस साल पहले  मैं कसौली [हिमांचल प्रदेश] दैनिक भास्कर की एडिटर कांफ्रेंस में शिरकत करने गया,तब बैकुंठ पेलेस हाटल से नर्गिस के कंद के आया और उसे गुल-बकावली की वो जड़ें भेजा जो उगती है..!

नर्गिस के कंद मैं अमरकंटक ले कर गया और बाबा कल्याण दास को आश्रम की वाटिका में उगने दिया पर शायद वातावरण की वजह न तो नर्गिस अमरकंटक में नर्गिस उगी न ही मेरे बिलासपुर के फार्म में..गुल बकावली बैकुंठ पेलेस में उगी या नहीं ये मुझे पता नहीं लगा..यदि उगी होगी तो वो गुलादते नुमा कवर में सफेद सुगन्धित फूल निरंतर देती होगी ..!

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

क्या कांग्रेस लोकसभा चुनाव बाद विपक्ष में बैठेगी ...


चार राज्यों में कांग्रेस की पराजय के बाद अब सवाल उठ खड़ा है की क्या लोकसभा चुनाव बाद कांग्रेस को विपक्ष में बैठना होगा ये सवाल उठ खड़ा हुआ है..ये सवाल उठाना लाजिमी है,सोनिया जी बड़ी मुश्किल से हिंदी में भाषण कर पाती है,मनमोहन सिंह को चुनाव लड़ने का अनुभव नहीं और राहुल में अनुभव की कमी है.कुछ रही सही कसर दामाद जी ने पूरी कर रखी है, हां प्रियंका में कुछ संभवना दिखती है और दिवंगत इंदिरा जी की छवि भी..!

कांग्रेस भीतरघात हुआ है ये कह कर बच नहीं सकती,हर पार्टी में भितरघातियों की कमी नहीं होती जो हारने के बाद ही उजागर होती है,कांग्रेस में वंशवाद आखिर कब तक,ये सवाल भी अब खड़ा हो गया है,पार्टी के मणिशंकर अय्यर ने आज मुंह खोला है और मनमोहन सिंह की वापसी की बात कही है,और भी सामने आ सकते हैं.


जिस तरह 'आम' ने जमींन से जुड़े प्रत्याशी चयन किये के कांग्रेस ऐसा कर सकती है,सोनियाजी अन्ना के जनलोकपाल ले बिल को न ला सकीं,मनमोहन महगाई पर लगाम न लगा पाए, राहुल का प्रत्यशी चयन का फार्मूला जमीन पर आने के पहले धराशाई हो गया.
कांग्रेस केन्द्रीय स्तर पर संगठन में दूसरी पंक्ति खड़ी न कर सकी है,वो शक्ति का केंद्रीय करण करती गई,पार्टी में लोकतंत्र की हत्या होती गई,प्रदेश के इन चुनाव में मुख्यमंत्री कौन होगा ये भी घोषित नहीं कर कसी.बिना सेनापति घोषित चुनाव लड़ा गया,नीति शास्त्र में लिखा गया है अगर समर में सेनापति नहीं तो जिस भांति चींटियों की पंक्ति तूफान में बिखर जाती है उस प्रकार समर में सेना..आखिर क्या मज़बूरी थी की मुख्यमंत्री का नाम घोषित किये बिना चुनाव समर में उतारने की विवशता बनी..!


लोक सभा चुनाव में अधिक वक्त नहीं, जो करना है आज कर ले कल कांग्रेस के पास वक्त नहीं होगा, पार्टी का नेटवर्क कमजोर है,अच्छे वक्ता नहीं,आखिर कब तक विरासत की पूंजी के आसरे ये सबसे पुरानी पार्टी चलेगी..आपनी पूंजी जुटानी होगी..पर कैसे ये सब होगा ये पार्टी को तय करना है..कोई बड़ी बात नहीं की कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में बड़ी तब्दीली हो जाये..!

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

हर बार बदलता अमरकंटक









अमरकंटक मुझे अपनी और खींचता है,मेरे बिलासपुर नगर से ये एक सौ पचीस किमी पर स्थित अमरकंटक में बचपन से आज तक कितनी बार गया गिन भी नहीं सकता माँ नर्मदा के शीतल जल में न जाने कितनी बार स्नान कर शांतचित हुआ, जिस भांति के नदी के पानी में कोई दूरी बार स्नान नही कर सकता उसी भांति में जब-जब गया नए नज़ारे देखा. इस बार अमरकंटक गया तो जो देखा वो भी नया था..मैं इस ब्लाग में फोटो अधिक दल रहा हूँ ताकि जिसे जरूरत हो वो सदर इसका उपयोग करे और इस तपोभूमि की महत्ता दूर दूर तक पहुंचे..!

फोटो फीचर कई शुरवात करता हूँ गुरुदावारे से..कोई चालीस-पचास साल पहले यहाँ मुनिजी ने गुरुद्वारे की स्थापना की अब जिसका जीर्णोद्धार किया जा चुका है..चूँकि यहाँ से कुछ दूर कबीर चबूतरे में गुरुनानक देव और संत कबीर मिले थे इस वजह इस इलाके कई और अहमियत है..प्रमुख सेवादार हरदीप सिंह ग्रेवल की लगन और आस्था यहाँ देखते बनती है, गुरूद्वारे में सौ से ज्यादा कमरों को आवास सुविधा है..ये कल्याण सेवा आश्रम से लगा है..उदासीन बाबा कल्याणदास गुरुदावारे को पिता और आश्रम को बेटे का घर निरुपित करते हैं,.यहाँ स्वामी शारदानंद जी के प्रयासों से सुंदर आश्रम निर्मित है.

आवास के लिए और भी प्रबंध है..दिसम्बर के अंत या जनवरी में पारा शून्य डिग्री तक पहुँच जाता है..सप्ताह भर भी रुका जा सकता है..देखने को निर्माण हो रहा जैन मंदिर,सरोवर साल के वन है..गर्मी के दिनों इसकी शीतलता बनी रहती है..पैंतीस सौ फिट की ऊंचाई पर अमरकंटक तपोभूमि के रूप से सदियों से प्रसिद्ध है..! 


माँ नर्मदा की उदगम स्थली में प्राचीन मंदिर,कपिलधारा,राह में सरसों के खेत,सघन वन से पश्चिम वाहनी नर्मदाजी का आगे बढ़ते जाना,बंदरों का उत्पात, ये कुछ फोटो संलग्न कर रहा हूँ..

मंगलवार, 12 नवंबर 2013

बस्तर बोला,सुने सरकार नक्सलियों की ये है हार


छतीसगढ़ में विधानसभा चुनाव का पहला चरण..नक्सलियों ने मुंह की खाई..!
भारत में ये मिसाल है, बस्तर जहाँ बेलेट ने बुलेट को विधानसभा चुनाव में मुहंतोड़ जवाब दिया है,नाव डुबो दी तो आदिवासियों ने कमर तक नदी लाँघ कर वोट दिया,कई शहरी इलाके में भी 61 फीसद वोट नहीं पड़ते,धमकी थी जिसने वोट दिया उसकी ऊँगली काट लेंगे,पर वनवासियों ने उन्हें अंगूठा दिख, दिया.,पहले चरण के मतदान बाद डा.रमन सिंह कर रहे है,बस्तर की आदिवासी महिलाओ ने आशीर्वाद दिया है,उधर चरण दस महंत कह रहे हैं .कांग्रेस को बढ़त मिलेगी ..!पर हकीकत है.जीते आदिवासी हैं,और हारे नक्सली..!

     जवानों ने साबित किया है की वो वोट करा सकते हैं, तो नक्सलियों को खदेड़ भी सकते है,ये नक्सली खौफ के खिलाफ उनकी विजय है उनको सलाम ..!ये भी साफ हो गया सरकार की इच्छाशक्ति नपुंसक रहती है, नक्सलियो को खदेड़ने में.. नही तो हमारे जवान कब का इस समस्या का अंत कर देते ..! आज भी बस्तर के आदिवासी लोकतंत्र के साथ हैं ..सरकार किसी की बने,पर जो संकेत बहादुर आदिवासियो ने दिया है, उस रस्ते पर चले,ये अधिक जरूरी है..! चुनाव बाद फ़ोर्स के हटाने के बाद नक्सली हताशा में आदिवासियों से बदला भांजने हिसा की वारदात को अंजाम न दे सके,इस ओर सरकार को सजकता बरतनी होगी ..!

बुधवार, 6 नवंबर 2013

'पुष्प की अभिलाषा' का ये हश्र

ख्यतिलब्ध कवि माखनलाल चतुर्वेदी जब बिलासपुर [अब छतीसगढ़ राज्य]में स्वधीनता के यात्रा के दौरान जेल में थे तब उन्होंने कविता ‘लिखी  'पुष्प की अभिलाषा,ये कविता बाद उसकी स्मृति में जिला जेल में और फिर कम्पनी गार्डन में लिखवा दी गई, पर जेल के करीब फूलों के बाजार के सामने  ‘पुष्प’ का जो हश्र है वो फोटो में दिखाई दे रहा है.. उनकी कविता है-
''चाह नहीं मैं सुर बाला के,गहनों में गुंथा जाऊं,
चाह नहीं प्रेमी माला में, बिंध प्यारी को ललचाऊ,
चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि डाला जाऊं,
चाह नहीं देवों के सिर पर, चढ़ भाग्य पर इठलाऊँ,
मुझे तोड़ा लेना बनमाली,उस पथ में देना तुम फेंक,
मा.. भूमि पर शीश चढ़ाने,जिस पथ जावें वीर अनेक..!


शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

पेड न्यूज का मुद्दा, दैनिक भास्कर और पत्रिका..


पांच राज्यों के नवंबर-दिसम्बर में होने वाले विधानसभा के चुनाव में आयोग की निगाह मीडिया की पेड न्यूज पर रहेगी. पेड न्यूज एक ऐसा गोरखधंधा है, जिसमें पाठक को लगता है कि वो अख़बार में चुनावी समाचार अथवा विश्लेष्ण पढ़ रहा है पर दरअसल वो खबर नहीं, विज्ञापन पढ़ रहा होता है, जिससे उनके दिमाग में या बैठा जाता है कि कौंन सी पार्टी या कौन सा प्रत्याशी चुनाव जीत रहा है. फिर भला हारने वाले को कौन मत दे कर ख़राब करना चाहेगा..!

अख़बारों की प्रतिस्पर्धा कोई लुकी-छिपी बात नहीं, दैनिक भास्कर ने पहले पेजकी जैकेट टाप में 
प्रकाशित किया ‘‘विधानसभा चुनाव, दैनिकभास्कर में पेड न्यूज नहीं’’ साथ पाठकों से निवेदन किया है कि यदि प्रकशित किसी खबर पर लगे की भास्कर स्थिति के विपरीत जा रहा है, तो जरूर बताये''.
अगले दिन ‘पत्रिका’ के पहले पेज पर प्रकाशित हुआ, ‘‘वो पेड न्यूज से कमाते हैं, हम खबर की कीमत चुकाते हैं.’जाहिर था बिना नाम दिए ये अख़बार पत्रिका किसी के लिए कह रहा है.फिर अगले दिन ‘पत्रिका’ ने प्रकाशित किया ‘’हमें बताएं जब कोई अख़बार के पेड न्यूज का व्यापार..!

अभी छतीसगढ़ में प्रत्याशियों ने मार्चा नहीं खोला पर अख़बार आमने-सामने होने लगे. मीडिया की छवि पाठकों के बीच अच्छी रही है और वो बनी रहे सभी चाहते हैं.  मीडिया प्रत्याशियों के चुनावी विज्ञापन भी खूब प्रकाशित करता है. इसमें क्या पैसे का वर्चस्व वाले उम्मीदवार को क्या लाभ नही मिलाता होगा. विज्ञापन ही वो आधार है जो अखबार  की आर्थिकी को बनाये रखता है .हो सकता है एक दिन ऐसा भी हो की चुनावी विज्ञापन भी चुनाव आयोग की नजर की किरकिरी बन जाएँ. फिलहाल प्रत्याशी के नाम दिया सारे विज्ञापन का सही लेखाजोखा रखना जरूरी है, कहीं तो ये कुल खर्च की सीमा से ये बढ़ सकते है.

 मीडिया प्रत्याशियों के चुनावी विज्ञापन भी खूब प्रकाशित करता है. इसमें क्या पैसे का वर्चस्व वाले उम्मीदवार को लाभ नहीं मिलाता होगा..? पर ये आय मीडिया केलिए जरूरी है.
विज्ञापन ही वो आधार है जो अखबार  की आर्थिकी को बनाये रखता है .हो सकता है एक दिन ऐसा भी हो कि चुनावी विज्ञापन भी चुनाव आयोग की नजर की किरकिरी बन जाएँ. क्योकि इससे समर्थवान प्रत्याशी को लाभ मिलाता है और ये धन का वर्चस्व को साबित करता है लोकप्रियता को नहीं. फिलहाल प्रत्याशी के नाम दिया सारे विज्ञापन का सही लेखाजोखा रखना जरूरी है, कहीं तो ये कुल खर्च की सीमा से ये बढ़ सकते है.चुनाव के इस मौसम में कुछ अख़बारों का जन्म ही पेड़ न्यूज के लिये होता है. वे पेड न्यूज के लिए पोशीदा दरवाजे खोल सकते हैं.यकीनन चुनाव आयोग के लिए इस सब को रोकना अतिरिक्त काम होगा पर ये अहम काम, निष्पक्ष चुनाव के लिए बेहद जरूरी है.

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

निष्पक्ष चुनाव:शराब वितरण रोकने महिलाओं को दे जवाबदारी


चुनाव सुधार की प्रकिया निरंतर जारी है, इस बार ‘कोई पसंद नहीं’ के लिए भी वोटिंग मशीन में बटन होगा. पर इतना ही काफी नहीं है, चुनाव प्रचार बंद होने के बाद मतदाताओं को लुभाने अथवा ये कहा जाये, मतिभ्रमित करने शराब का जिस बड़े पैमाने में किया जाता है, उसके सामने मतदान की निष्पक्षता दम तोड़ देती है,, जिस शराबबंदी की बापू हिमायत करते थे वो शराब मतदान के बाद नतीजों पर निर्णायक भूमिका निर्वाह कराती चल रही है !

समाज में इतनी जागरूकता आई है की गाँव की महिलाएं अवैध शराब विक्रय की रोकथाम में वो कठोर कदम उठती दिखने लगी है, वो शराब के खिलाफ समूह बन कर कलेक्टर के दरवाजे पर दस्तक देती हैं, गाँव में शराब पीने वालों को सबक सिखाती है, यहाँ तक शराब ठेकेदार के गुर्गे भी उनसे दूरी बना कर चलते है. ये है नारी सशक्तिकरण, नारी जान चुकी है कि, शराब ने उनके घर का बजट बिगाड़ा है.और नशे के दुष्परिणाम क्या हैं, चुनाव आयोग महिलाओं की इस ताकत का आसन्न चुनाव में बखूबी उपयोग कर सकता है जिसके सकारात्मक नतीजे चुनाव परिणाम मिलाना तय है.

नामांकन दाखिले के साथ चुनाव आयोग शराब फैक्ट्री, से लेकर शराब ठेकेदारों पर नजर बनाये कि  मदिरा की कोई बड़ी खेप किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार तक न तो नहीं पहुँच रही है.आम अवधारण बन चुकी है कि ये शराब मतदान को प्रभावित करती है. मतदान के पहली रात शराब किसी की हार को जीत में बदल देती है, शराब और बकरा गाँव में प्रत्याशी की तरफ से वितरण कारने की परिपाटी इस तरह पैठ कर चुकी है कि कुछ मुहल्लों के मतदाता मांग करते हैं या गरीब वर्ग के मतदाता इसके लिए आस लगा के बैठे रहते है.

संविधान में हर बालिग़ कोएक देने का अधिकार है, ऐसी दशा में किसी के विवेकपूर्ण मतदान,दूसरी तरफ किसी नशे में डगमगाते का वोट भला कैसे बराबर हो सकता है. कुछ तो वोट डालने के बाद राह में गिरे-पड़े दिखते हैं. इनको अपने वोट की अहमियत का ज्ञान आज तक नहीं है. कोई ये देखने वाला भी नहीं होता की मतदान करने वाला क्या मतदान केंद्र में शराब पी कर 'भारत भाग्य विधाता बना' हुआ है. न जाने ये सिलसिला कब थमेगा..चुव सुधार के लिए प्रकिया सतत चल रही है आशा की जा सकती है चुनाव आयोग यदि चाहे तो एक दिन ऐसा आएगा जब 'महिला समूह'  गाँव-गाँव में मतदान के पहले वितरण होने वाली शराब को रोकने में कामयाबी होंगी पर उसके लिए प्रशासन और चुनाव आयोग दवारा  'महिला समूहों' को प्रोत्साहित करने की ठोस योजना को प्रभावी तरीके से लागू करनी होगी ..!