गुल बकावली का फूल आज से पचास साल पहले अमरकंटक में माई की बगिया के दलदल में खिलता था, तब यहाँ इतना दलदल होता कि, यदि लकड़ी उसमें डाल दे तो खीच कर निकलना कठिन होता था.तब में अपने पिताजी चमनलाल चड्ढा जी के साथ जब भी अमरकंटक जाता तो माई की बगिया में इसके फूलों को देखता और किसी नई चीज को देखने की सुखद अनुभूति होती..
आज वातावरण में तब्दीली के कारण माई की बगिया में गर्मी में थोड़ी से जगह में यहाँ दलदल बचा रहता है,मगर गुल बकावली के फूल आज भी वहां खिलते है,पर उतने नहीं बहुत कम. नेत्र रोगों के लिए अचूक ये औषधीय फूल अमरकंटक के अलावा अब मैदानी इलाके में भी गया है, और ये मेरी बिलासपुर में गाँव मंगला की बगिया के सुगन्धित फूलों में एक है..!मैंने से कुछ सीपेज वाले क्षेत्र में लगाया है जहाँ गोबर खाद की भरमार है..!
मेरे पास इसके काफी पेड़ हो गये है, ये बरसात से ठंड तक खूब खिलते हैं, दस साल पहले मैं कसौली [हिमांचल प्रदेश] दैनिक भास्कर की एडिटर कांफ्रेंस में शिरकत करने गया,तब बैकुंठ पेलेस हाटल से नर्गिस के कंद के आया और उसे गुल-बकावली की वो जड़ें भेजा जो उगती है..!
नर्गिस के कंद मैं अमरकंटक ले कर गया और बाबा कल्याण दास को आश्रम की वाटिका में उगने दिया पर शायद वातावरण की वजह न तो नर्गिस अमरकंटक में नर्गिस उगी न ही मेरे बिलासपुर के फार्म में..गुल बकावली बैकुंठ पेलेस में उगी या नहीं ये मुझे पता नहीं लगा..यदि उगी होगी तो वो गुलादते नुमा कवर में सफेद सुगन्धित फूल निरंतर देती होगी ..!




